Daily Archive: September 27, 2017

Cabinet approves Enhancement of age of superannuation of doctors other than Central Health Service (CHS) doctors to 65 years

The Union Cabinet chaired by Prime Minister Shri Narendra Modi has approved the enhancement of age of superannuation of doctors other than Central Health Service (CHS) doctors to 65 years in the following manner:

  1. Ex-post facto approval to enhance the superannuation age of doctors of Indian Railways Medical Service to 65 years.
  2. Ex-post facto approval to enhance the superannuation age to 65 years for doctors working in Central Universities and IITs (Autonomous Bodies) under Department of Higher Education and doctors in Major Port Trusts (Autonomous Bodies) under Ministry of Shipping.

iii. The superannuation age has been enhanced to 65 years in respect of doctors under their administrative control of the respective Ministries/Departments [M/o of AYUSH (AYUSH Doctors), Department of Defence (civilian doctors under Directorate General of Armed Forces Medical Service), Department of Defence Production (Indian Ordnance Factories Health Service Medical Officers), Dental Doctors under D/o Health & Family Welfare, Dental doctors under Ministry of Railways and of doctors working in Higher Education and Technical Institutions under Department of Higher Education].

  1. The Union Cabinet has further approved that doctors shall hold the administrative posts till the date of attaining the age of 62 years and thereafter their services shall be placed in Non-Administrative positions.

The decision would help in better patient care, proper academic activities in Medical colleges as also in effective implementation of National Health Programmes for delivery of health care services.

Around 1445 doctors of various Ministries/Departments of the Central Government would be benefitted.

The decision will not have much financial implications as large number of posts are lying vacant and the present incumbents would continue to work in their existing capacity against sanctioned posts.

Background :

  • The age of superannuation of doctors of Central Health Service was enhanced to 65 years w.e.f 31st May, 2016.
  • The doctors other than Central Health Service including doctors of other systems of Medicine of Central Government requested for enhancement of age of superannuation on the ground of parity with CHS and shortage.

Global Crude oil price of Indian Basket was US$ 57.18 per bbl on 26.09.2017

The international crude oil price of Indian Basket as computed/published today by Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) under the Ministry of Petroleum and Natural Gas was US$ 57.18 per barrel (bbl) on 26.09.2017. This was higher than the price of US$ 56.42 per bbl on previous publishing day of 25.09.2017.

In rupee terms, the price of Indian Basket increased to Rs. 3735.95 per bbl on 26.09.2017 as compared to Rs. 3657.92 per bbl on 25.09.2017. Rupee closed weaker at Rs. 65.34 per US$ on 26.09.2017 as compared to Rs. 64.84 per US$ on 25.09.2017. The table below gives details in this regard:

Particulars Unit Price on September 26,  2017 (Previous trading day i.e. 25.09.2017)
Crude Oil (Indian Basket) ($/bbl)              57.18          (56.42)
(Rs/bbl)             3735.95        (3657.92)
Exchange Rate (Rs/$)              65.34           (64.84)

 

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इकोनॉमी पर मोदी सरकार को अपनों ने ही घेरा, 2019 के लिए खतरे की घंटी!

नई दिल्ली. नोटबंदी और अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के ही एक वरिष्ठ नेता ने सरकार और वित्त मंत्री को आइना दिखा दिया है. अर्थव्यवस्था के हालात लेकर विपक्ष सरकार पर पहले से हमलावर था लेकिन अब यशवंत सिन्हा जैसे नेता के वार ने सरकार को परेशान कर डाला है. यशवंत सिन्हा एनडीए सरकार में वित्त मंत्री भी रह चुके हैं. यशवंत सिन्हा ने लिखा कि ‘निजी निवेश में आज जितनी गिरावट है उतनी दो दशक में नहीं हुई, औद्योगिक उत्पादन का बुरा हाल है, कृषि क्षेत्र परेशानी में है, बड़ी संख्या में रोजगार देने वाला निर्माण उद्योग भी इस वक्त संकट में है.’

सिन्हा ने कहा कि नोटबंदी ने सिर्फ आग में घी डालने का काम किया है. यशवंत सिन्हा ने अरुण जेटली पर हमला बोलते हुए अपने लेख में कहा है कि ‘प्रधानमंत्री ये दावा करते हैं कि उन्होंने काफी करीब से गरीबी देखी है. उनके वित्त मंत्री इस बात के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं कि देश का हर नागरिक भी गरीबी को करीब से देखे.’ यशवंत सिन्हा ने यह कहकर माहौल और गरमा दिया है कि बीजेपी के भीतर भी बहुत सारे नेता उन्हीं की तरह सोच रहे हैं, लेकिन, डर से जुबान नहीं खोल पा रहे.

यशवंत सिन्हा का बयान क्या सचमुच सरकार के लिए आंखे खोल देने वाला है. विपक्षी दलों से लेकर अपनों के इस हमले से एनडीए को क्या सच में नुकसान हो सकता है. हम उन 5 बिंदुओं पर बात करेंगे जिनपर या तो सरकार का रुख साफ नहीं है या बीते कुछ महीनों से इन्हीं बिंदुओं पर सरकार को निगेटिव मार्किंग मिली है. 2019 में एनडीए सरकार के लिए अगर खतरे की घंटी बजी तो ये कारक अहम होंगे.

जीएसटी का जख्मः जीएसटी के फैसले ने अर्थव्यवस्था को राहत दी या नहीं ये तो दीर्घकालीन विषय है लेकिन वर्तमान समय में देश के व्यापारियों को सरकार के इस कदम ने औंधे मुंह गिरा दिया है. छोटे बड़े सभी व्यापारी इस फैसले से दुखी हैं. जीएसटी के लिए अप्लाई करना भी बेहद जटिल विषय है. कई व्यापारियों का पूरा पूरा दिन सीए के पास ही बीत रहा है. सीए फीस बढ़ाकर अधिक पैसे वसूल रहे हैं. व्यापार चौपट हो रहा है. एक हिंदी टीवी चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल दिवाली से पहले मुंबई के कालबादेवी इलाके में स्थित स्वदेशी बाजार में लोगों की भीड़ लगी रहती है. 100 साल से भी पुराने इस बाजार में से पूरे देश भर में कपड़े निर्यात की जाती है लेकिन कपड़े पर 5 फीसदी जीएसटी लगने के बाद से बाजार फीका पड़ता दिख रहा है.

दुकानदारों ने बातचीत करते हुए बताया कि उन्होंने सोचा था कि जीएसटी के लागू होने के बाद चीज़ें सस्ती हो जाएंगी और व्यवसाय करना और भी सरल हो जाएगा लेकिन कपड़े पर पांच फीसदी जीएसटी लगने के बाद से कपड़े की मांग लगभग आधी हो गई है. यह हाल केवल स्वदेशी बाजार का ही नहीं है. मुंबई से सटे भिवंडी के पॉवरलूम का भी यही हाल है. जीएसटी के लागू होने के बाद से कई लोगों ने अपनी हैंडलूम बंद कर दिए हैं जिसका असर मजदूरों पर पड़ रहा है.

नोटबंदी की मारः यशवंत सिन्हा ने कहा कि इकोनॉमी में तो पहले से ही गिरावट आ रही थी, नोटबंदी ने तो सिर्फ आग में घी का काम किया. पूर्व पीएम और अर्थशास्त्री पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हाल में चेताया कि देश की जीडीपी में तेज गिरावट होगी. सिंह ने कहा कि जीएसटी और नोटबंदी का जल्‍दबाजी में क्रियान्‍वन आर्थ‍िक प्रगति पर नकरात्‍मक असर जरूर डालेगा. चालू वित्त वर्ष की जून में खत्म हुई तिमाही के दौरान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई और यह वित्त वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही के 6.1 फीसदी से घटकर 5.7 फीसदी पर आ गई. पिछले साल इसी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 7.9 फीसदी थी.

पूर्व प्रधानमंत्री ने पिछले साल नोटबंदी के बाद संसद में भविष्‍यवाणी की थी कि जीडीपी में दो प्रतिशत की गिरावट होगी. उन्‍होंने कहा था कि नोटबंदी एक ‘ऐतिहासिक आपदा, संगठित और कानूनी लूट’ है.

बैंकों का क्रेडिट रेट हुआ निगेटिवः नोटबंदी के बाद बैंकों का क्रेडिट रेट 60 वर्षों में सब से कम पर ही नहीं, बल्कि जुलाई में निगेटिव में चला गया था. ऐसा कहा गया कि उद्योग निवेश नहीं कर रहा है, इसलिए क्रेडिट ऑफ टेक कम हो गया. वजह यह है कि इंडस्ट्री में डिमांड कम है. कैपेसिटी यूटीलाइजेशन पर जो आरबीआई ने आंकड़ें पेश किए हैं, उसके अनुसार कैपेसिटी यूटीलाइजेशन 70 प्रतिशत पर पहुंच चुका है. अब इतनी नीचे स्तर पर निवेश नहीं होता है, तो क्रेडिट की डिमांड कम हो जाती है. इन सभी चीजों से संगठित क्षेत्र के साथ असंगठित क्षेत्रों में भी असर पड़ा है

मेक इन इंडिया को झटकाः जीएसटी और नोटबंदी ने मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी तगड़ा झटका दिया. विनिर्माण क्षेत्र की कई कंपनियां दिवालिया होने का कगार पर आ गई. ब्लूमबर्ग क्विंट के मुताबिक, बुनियादी ढांचा क्षेत्र में कंपनियों का एनपीए मार्च 2017 में 7.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया. अगस्त के अंत में एक अध्ययन में यह बात सामने आयी कि 2017 को समाप्त तिमाही में 2,726 गैर-सरकारी और गैर-वित्तीय कंपनियों का शुद्ध लाभ 6.9 प्रतिशत पर आ गया जबकि 25 करोड़ रुपए से कम का कारोबार करने वाली छोटी कंपनियों की बिक्री में 57.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.

सरकार में उलझनः अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने एक हिंदी वेबसाइट से बातचीत में कहा कि अरुण जेटली ने नोटबंदी के बचाव में कहा था कि इसे सिर्फ एक योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे जीएसटी और डिजिटलाइजेशन से जोड़ कर देखा जाना चाहिए. डिजिटलाइजेशन की जहां तक बात है, अगर आप लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना चाहते हैं तो इसे बिना नोटबंदी के भी किया जा सकता था. जीएसटी के लिए भी नोटबंदी की ज़रूरत नहीं थी. इसलिए सरकार इन दोनों को जोड़ कर न देखे.

जब इन्होंने देखा कि बहुत भारी संख्या में नोट वापस आ रहे हैं, तो उन्होंने तुरंत कैशलेस और डिजिटलाइजेशन की बात करनी शुरू कर दी. प्रधानमंत्री ने भी यह सभी बात 27 नवंबर वाले कार्यक्रम में बोलना शुरू किया, जबकि 8 नवंबर वाले भाषण में उन्होंने इस तरह का कोई जिक्र नहीं किया था. नोटबंदी के लिए इनको बड़ी तैयारी करनी चाहिए थी. हमने देखा किस प्रकार लोगों को दिक्कत आई और कई लोग परेशान हुए. अगर इन्होंने इसकी तैयारी की होती तो इस तरह नहीं होता जैसे उस समय हुआ था.