कर दे ना बरबाद , यह आरक्षण की आग। हेमंत ‘स्नेही’ जी का आरक्षण पर काव्य द्वारा कटाक्ष

हेमंत ‘स्नेही’

कितनी ही भाषाएँ हैं,
कितने हैं परिवेश,
जाति-धर्म के नाम पर
क्यों जलने दें देश।

राजाओं के ठाठ पर
कहते खुद को रंक,
घायल करता देश को
आरक्षण का डंक।

मिल जाएगा रास्ता
करो बैठ कर बात,
याद दिलाते व्यर्थ में
बात-बात में जात।

दलितों के ही नाम पर
लगा रहे हैं दाग,
कर दे ना बरबाद यह
आरक्षण की आग।

आगजनी कर दिखा रहे
बीच सड़क पर क्रोध,
मगर सार्थक कब हुआ
कभी कहीं प्रतिशोध।

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